राष्ट्र, समाज और संस्कृति को समर्पित पुरातत्व-जगत के भीष्म-पितामह “रायबहादुर डॉ. हीरालाल जी राय” की १५२वीं जयंती पर शत् शत् नमन्…🙏

🇮🇳🕉⛳
राष्ट्र, समाज और संस्कृति केे संवाहक रायबहादुर डाक्टर हीरालाल जी राय की 125वी जयंती पर DekhoLateri.com के प्रधान संंपादक सत्ययनाराय का विशेष संपादकीय

मध्यप्रदेश में पुरातत्व-जगत के भीष्मपितामह रायबहादुर डॉ. हीरालाल ने अनेक विद्याओं का न केवल स्पर्श किया वरन् उन क्षेत्रों में एक अधिकारपूर्ण स्थान भी प्राप्त किया ।संस्कृति ,इतिहास, पुरातत्व, शिलालेख-अन्वेषण, नृतत्वशास्त्र, साहित्य, काव्य, और प्रशासन सरीखी ज्ञान की अनेक विद्याओं में एक गरिमामय-स्थान पर प्रतिष्ठित हुए।
साहित्याचार्य श्री जगन्नाथ प्रसाद
“भानु” ने आपकी कीर्ति-गान में लिखा है :
हीरा मध्यप्रदेश के ,
भारत के प्रिय लाल ।
कीर्ति तुम्हारी अमर है,
पंडित हीरालाल ॥


डॉ. हीरालाल जी का जन्म १अक्टूबर १८६७ को मध्यप्रदेश के कटनी नगर(वर्तमान में जिला मुख्यालय) में हुआ ।गवर्नमेंट कालेज जबलपुर से१८८८ में विज्ञान में स्नातक की उपाधि ग्रहण करने के बाद उन्होंने विभिन्न पदों पर रहकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उन्होंने एक अध्यापक, विज्ञान प्रशिक्षक, उनन्त कृषि प्रशिक्षक , स्कूल निरीक्षक, अकाल राहत अधिकारी , जनगणना कार्य में सहायता देने के लिए अतिरिक्त सहायक आयुक्त के रूप में कार्य किया ।उन्हें रायपुर, सागर, बालाघाट, नागपुर, जबलपुर, एवं छत्तीसगढ़ जैसे अनेक स्थानों पर विशेष कार्य सौपे गये ।


उन्होंने१९१० में हिन्दी में मध्यप्रदेश के जिला गजेटियर्स तैयार किये। अन्य प्रान्तों ने भी इस काम का
उनका अनुसरण किया जिसके सम्मानार्थ तात्कालीन सरकार ने उन्हें ” रायबहादुर “की उपाधि से अंलकृत किया गया ।


मध्य प्रान्त के इतिहास और पुरातत्व में उनका असाधारण -अनुसंधान कार्य १९१४में “इन्स्क्रिप्शन्स “नाम से प्रकाशित हुआ, उनकी वृहद संदर्भ कृति
” दि ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स अॉफ दि सेण्ट्रल प्रोविन्सेज अॉफ इंडिया ”
(रसेल के सहयोग से ) देश-विदेश में सराही जाती है । सन् १९१६ से उक्त ग्रंथ के १२संस्करण प्रकाशित हो चुके है ग्रंथ की पृष्ठ संख्या २१७२है और यह भारतीय न्यायालयों में साक्ष्य के लिए अधिकृत है।


सर जॉर्ज ग्रियर्सन के कहने पर उन्होंने मध्य प्रान्त की आदिम बोलियों की ग्रामोफोन रिटर्निंग करते हुए वहाँ का भाषायी सर्वेक्षण किया वे एक सुविख्यात हिन्दी लेखक थे जो अपनी विशुद्ध प्रांजल शैली के लिए प्रसिद्ध थे ।
दमोह, वर्धा, नरसिंहपुर आदि जिलों के डिप्टी कमिश्नर (कलेक्टर) के पद पर पदस्थ हुए।
तब भी आप लोक -प्रिय रहे है।
सेवा निवृत्ति के पश्चात आप अपने पैतृक नगर कटनी में आकर बस गए जहाँ उन्होंने ” मध्य प्रान्त में संस्कृत एवं प्राकृत पाण्डुलिपियों की विवरणात्मक ग्रथ-सूची ” संकलित की जिससे १००००पाण्डुलिपियाँ प्रकाश में आई ।
डॉ हीरालाल नागपुर विश्व-विद्यालय से उसकी स्थापना के समय से ही जुड़े रहे, “हिन्दी साहित्य परिषद ” का शुभारम्भ कराने तथा स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में हिन्दी को मान्यता दिलाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही, वे अपनी जन्मभूमि कटनी में ही बसे रहना चाहते थे ,अत: उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति का पद स्वीकार नही किया , शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रशंसनीय कार्य लिए विश्वविद्यालय ने १९३३ में उन्हें डॉक्टर अॉफ लिटरेचर की सम्मानार्थ उपाधि प्रदान की ।
१९३० में वे पटना में संपन्न हुई आल इंडिया ओरिएण्टल कान्फ्रेंस के सभापति चुने गये।

नोट : तब से मध्यप्रदेश का कोई पुरातत्ववेत्ता उक्त सभा का सभापति अथवा अध्यक्ष नही चुना गया पूर्व में भी अधिकांशत:उक्त पद पर ब्रिटिशियन ही काबिज रहते थे।
१९३३में उन्होंने लंदन में आयोजित पुरातत्व सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर पराधीन राष्ट्र को गौरान्वित कराया। आप “नागरी प्रचारिणी सभा काशी ” के संस्थापक व अध्यक्ष भी रहे। आपने नागपुर और मद्रास में आयोजित विज्ञान कांग्रेस के नृशास्त्र प्रशाखा की अध्यक्षता भी की ।
सुविख्यात इतिहासकार होने के नाते “इण्डियन एण्टीक्वेरी”, ” एपिग्राफिया इंडिका”, “दि जर्नल अॉफ दि रॉयल एशियाटिक सोसाइटी” आदि में उनके अनेक लेख प्रकाशित हुए ,वे भारत सरकार में पुरातत्व के मानसेवी संवाददाता भी रहे।

 १९अगस्त १९३४ को डॉ. हीरालाल जी का देहावसान हो गया। तब   राष्ट्रकवि मैथिलिशरण गुप्त ने  

” सरस्वती” में रायबहादुर साहब को
अपनी श्रद्धांजलि निम्नांकित पंक्तियाँ लिखी :-
अयि अतीत तेरे ढेले भी ,
दुर्लभ रत्न तुल्य चिरकाल।
पर तेरा “तत्वज्ञ” स्वयं ही ,
एक रत्न था “हीरालाल” ॥

  भारत सरकार हीरालाल जी  के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप डाक-टिकट जारी की ।
 महामहिम  राष्ट्रपति  डॉ शंकर दयाल शर्मा  ने शिलालेख ग्रथ में

प्रकाशित एक संदेश में “रायबहादुर डॉ हीरालाल ” के विषयक कहा है :-

 "" कुछ प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ऐसे होते हैं जो समय की शिला पर अपने पदचिह्न छोड़ जाते हैं। किसी भी सजग समाज का यह दायित्व होता है कि वह उन पदचिह्नों को मिटने न दें।"

🙏🏻 साभार 🙏🏻

सत्यनारायण चौकसे
युवा प्रदेश संघटन मंत्री
राष्ट्रीय कलचुरी एकता महांसघ

KalaaR_Samaaj #Satya_kalaaR

Satyanarayan Chouksey

Jay ho lateri